पाली सेक्टर के आंगनबाड़ियों में पोषण आहार योजना पर पलीता : बच्चों के हक का रेडी टू ईट बिक रहा गौशालाओं में, अधिकारी कार्यालय के वातानुकुलित कक्ष में मस्त

कोरबा/पाली:- महिला एवं बाल विकास विभाग की महत्वाकांक्षी रेडी टू ईट पोषण आहार योजना पाली परियोजना के सेक्टर पाली ही में दम तोड़ती नजर आ रही है। जमीनी हकीकत यह है कि नौनिहालों, किशोरी बालिकाओं, गर्भवती और शिशुवती माताओं के सेहत के लिए भेजा जाने वाला पोषण आहार उन्हें पोषित करने के बजाय कार्यकर्ताओं की जेब भर रहा है।
पाली सेक्टर में पाली नगर सहित ग्राम मादन, केराझरिया, दमिया, सैला आता है और इनके अंतर्गत करीब तीन दर्जन आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। शासन के नियमानुसार प्रत्येक मंगलवार को सभी पंजीकृत हितग्राहियों को रेडी टू ईट का अनिवार्य वितरण होना है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। अनेकों हितग्राहियों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि उन्हें महीने में एक या दो पैकेट ही थमा दिया जाता है और रजिस्टर में पूरा वितरण दिखा दिया जाता है। अब सवाल यह उठता है कि शेष बचा पोषण आहार आखिर जाता कहां है? इसे लेकर सूत्रों का दावा चौंकाने वाला है तथा आरोप है कि कार्यकर्ताओं द्वारा शासन के मुफ्त पोषण आहार को दुग्ध उत्पादक गौ पशुपालकों को पशु आहार के रूप में बेचा जा रहा है। यानी जो आहार बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए भेजा जा रहा, वो मवेशियों का चारा बन रहा है। यह सीधे- सीधे बच्चों के पोषण और माताओं के स्वास्थ्य के साथ आपराधिक खिलवाड़ है।

*नियमों की भी उड़ रही धज्जियां, घर के एक कमरे में चल रही आँगनबाड़ियाँ*
प्राप्त जानकारी के अनुसार कई केंद्रों पर आंगनबाड़ी भवन या तो जर्जर हैं या हैं ही नहीं। नियमानुसार ऐसी स्थिति में किराए का हवादार, रोशनीयुक्त, बच्चों के खेलने और अक्षरज्ञान सीखने लायक भवन लेना अनिवार्य है। कार्यकर्ता को अपने निजी घर में केंद्र संचालित करने की मनाही है। लेकिन अन्य सेक्टर तो दूर, पाली सेक्टर में ही इस नियम को ठेंगा दिखाया जा रहा है। कई कार्यकर्ता अपने घर के एक छोटे से सुविधाविहीन कमरे में ही आंगनबाड़ी चला रही हैं, जहां न बच्चों के लिए जगह है, न खेल सामग्री और न ही सीखने का माहौल। सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह निगरानी तंत्र पर लग रहा है और चिंताजनक पहलू है विभागीय किकर्तव्यविमूढ़ता। मैदानी अमले को इन केंद्रों तक पहुंचने की फुर्सत नहीं है, तो परियोजना अधिकारी कभी औचक निरीक्षण कर जमीनी सच्चाई जानने की कोशिश करने के बजाय अपने वातानुकूलित कार्यालय में बैठे- बैठे कागजी घोड़ा दौड़ाकर योजना को सफल बताते हुए कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं। बच्चों, हितग्राहियों को उनके आंगनबाड़ी से नियमित पोषण आहार मिल रहा है, इससे मैदानी कर्मचारी को मतलब नही, तो अपने निजी घरों में आंगनबाड़ी चला रही कार्यकर्ताओं पर अधिकारी मेहरबान है। जिससे शासन की महत्वाकांक्षी पोषण आहार योजना और इसका उद्देश्य विफल हो रहा है। ऐसे में यह कहना अनुचित न होगा कि जब ब्लाक मुख्यालय के सेक्टर में यह हाल है, तो अन्य सेक्टर और उनके दूरस्थ, वनांचल क्षेत्रों में क्या हालात होंगे? बहरहाल बच्चों, हितग्राहियों के हक का पोषण आहार उन्हें नियमित उपलब्ध हो सके, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, अन्यथा कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़ का सपना पाली परियोजना में सपना ही रह जाएगा।










